वसुधा जी को काफी वक्त हो गया था इंतज़ार करते हुए, लेकिन दरवाजा अब तक नहीं खुला था। उनकी बेचैनी बढ़ती जा रही थी। मन ही मन वो बुदबुदाईं, "बस माता रानी, रक्षा करना वंशिका की... वो राक्षस हो चुका होगा। बेचारी, पता नहीं कैसे सहती रही होगी!"
वो इन्हीं विचारों में डूबी थीं कि अचानक दरवाजा खुला। उनकी आंखें बड़ी हो गईं, क्योंकि सामने अनिरुद्ध खड़ा था—बस एक शॉवर अपनी कमर पर लपेटे हुए।
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